अपने पारंपरिक व्यवसाय के साथ आमदनी बढ़ाने का अवसर तलाश रहे ग्राम शेरपुर निवासी श्री अरुण राठौर के लिए मत्स्य पालन लाभकारी पहल साबित हुआ है। आधुनिक बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन शुरू करने के बाद उन्होंने फिश फीड यानी मछलियों के आहार की बिक्री को भी अपने व्यवसाय से जोड़ा। इस पहल से उनकी आय बढ़ी और आसपास के मत्स्य पालकों को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण फिश फीड उपलब्ध होने लगा।

श्री राठौर ने सहायक संचालक मत्स्य विभाग, सीहोर के कार्यालय से संपर्क किया और मत्स्य पालन को अतिरिक्त आय के साधन के रूप में अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने बायोफ्लॉक पोंड तकनीक से मछली पालन की शुरुआत की। सीमित क्षेत्र में नियंत्रित जल व्यवस्था के साथ मछली पालन की इस तकनीक में पानी की गुणवत्ता, ऑक्सीजन की उपलब्धता और मछलियों के आहार का नियमित प्रबंधन आवश्यक होता है।

शुरुआती दौर में श्री राठौर के सामने कई चुनौतियां आईं। मछलियों को उचित आहार देना, पानी की गुणवत्ता बनाए रखना, तकनीकी प्रबंधन समझना और तैयार मछलियों के लिए बाजार तलाशना उनके लिए नए अनुभव थे। उन्होंने नियमित देखरेख और अनुभव से इन चुनौतियों को संभाला। धीरे-धीरे मछलियों की वृद्धि बेहतर होने लगी और उत्पादन को बाजार में उचित मूल्य मिलने लगा।

मछली पालन में मिले सकारात्मक परिणामों ने उन्हें व्यवसाय के विस्तार के लिए प्रेरित किया। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि आसपास के मत्स्य पालकों को भी गुणवत्तापूर्ण फिश फीड की आवश्यकता रहती है। स्थानीय बाजार की इस जरूरत को समझते हुए उन्होंने मछली पालन के साथ फिश फीड विक्रय का कार्य शुरू किया।

इस निर्णय से श्री राठौर ने मत्स्य पालन से जुड़ी दो गतिविधियों को अपनी आय का आधार बना लिया। एक ओर मछली उत्पादन से आमदनी होने लगी, वहीं दूसरी ओर फिश फीड की बिक्री से अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित हुआ। इससे उनके व्यवसाय का दायरा बढ़ा और अन्य मत्स्य पालकों की आहार संबंधी जरूरतें पूरी करने में भी सहयोग मिला।

श्री अरुण राठौर की पहल आधुनिक तकनीक, नियमित देखरेख और बाजार की जरूरतों की समझ से व्यवसाय को आगे बढ़ाने का उदाहरण है। उन्होंने मछली उत्पादन के साथ उससे जुड़े व्यवसाय की संभावना पहचानी और उसे अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ाई। उनकी सफलता अन्य मत्स्य पालकों को भी उत्पादन के साथ संबंधित व्यवसायों के अवसर तलाशने की प्रेरणा देती है।