मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र के पशुपालकों को उन्नत नस्ल के दुधारू पशु उपलब्ध कराकर दुग्ध उत्पादन में वृद्धि करना, उनकी आय में बढ़ोतरी करना तथा स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है।
श्रीमती रसुम बाई के पास योजना का लाभ लेने से पूर्व 02 गाय थीं, जिनसे प्रतिदिन लगभग 10 लीटर दूध का उत्पादन होता था। दूध को लगभग ₹45 प्रति लीटर की दर से बेचने पर उनकी मासिक आय लगभग ₹24,300/- थी।
सीमित पशुधन एवं कम दुग्ध उत्पादन के कारण परिवार की आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही थी।
मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना की जानकारी प्राप्त होने पर श्रीमती रसुम बाई ने पशु चिकित्सालय बैरसिया में संपर्क किया। विभागीय अधिकारियों द्वारा उन्हें योजना की विस्तृत जानकारी एवं आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया गया।
हितग्राही द्वारा योजना के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया गया।
योजना के माध्यम से जनवरी 2026 में हितग्राही को 02 मुर्रा नस्ल की भैंसें प्राप्त हुईं। इन भैंसों के माध्यम से दुग्ध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और परिवार की आय का एक मजबूत एवं नियमित स्रोत विकसित हुआ।
योजना का लाभ मिलने के बाद दोनों मुर्रा भैंसों से प्रतिदिन लगभग 27 लीटर दूध का उत्पादन होने लगा। दूध की बिक्री लगभग ₹50 प्रति लीटर की दर से की जा रही है। इससे दोनों भैंसों से लगभग ₹40,500/- प्रतिमाह की आय प्राप्त हो रही है।
पूर्व में उपलब्ध आय तथा योजना से प्राप्त अतिरिक्त आय को मिलाकर हितग्राही की कुल मासिक आय लगभग ₹64,000/- तक पहुंच गई है।
इस प्रकार मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना ने श्रीमती रसुम बाई के परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के साथ-साथ उन्हें पशुपालन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान किया है।
पशुपालन विभाग द्वारा हितग्राही को समय-समय पर पशु उपचार, टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान, पशु बीमा तथा तकनीकी मार्गदर्शन जैसी आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। विभागीय मार्गदर्शन से हितग्राही पशुओं के बेहतर प्रबंधन एवं दुग्ध उत्पादन को बनाए रखने में सक्षम हो रही हैं।
श्रीमती रसुम बाई की कहानी यह दर्शाती है कि योजनाबद्ध तरीके से पशुपालन को अपनाकर ग्रामीण परिवार अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना के माध्यम से प्राप्त मुर्रा भैंसों ने उनके दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के साथ-साथ परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है।
आज श्रीमती रसुम बाई पशुपालन को केवल पारंपरिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि आय एवं स्वरोजगार के स्थायी साधन के रूप में अपना रही हैं। उनकी सफलता ग्रामीण क्षेत्र के अन्य पशुपालकों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

